धूप का टुकड़ा (भाग 2)
अध्याय 4: दीवारें बड़ी, दिल छोटे
नए घर की भव्यता के साथ-साथ घर के सदस्यों के बीच की दूरियां भी जैसे नक्शे के हिसाब से बढ़ गई थीं। पुराने घर में एक ही बड़ा कमरा था जहाँ सब बैठते थे, एक ही मेज़ थी जहाँ सब साथ खाना खाते थे। वहाँ छुपने की जगह नहीं थी, इसलिए झगड़े भी होते तो सुलह भी वहीं आँगन में हो जाती थी।
पर इस नए 'विला' में हर किसी का अपना 'प्राइवेट स्पेस' था।
सुमित अपने होम-ऑफिस में बंद रहता, रीना अपने आलीशान बेडरूम में वेब-सीरीज़ देखती, और बच्चे अपने प्ले-स्टेशन की आभासी दुनिया में खोए रहते। शारदा जी अक्सर हॉल में सोफे पर बैठी रहतीं, यह इंतज़ार करते हुए कि कोई गुज़रे और उनसे दो बातें करे। पर वहां सिर्फ सन्नाटा गुज़रता था, या कभी-कभार काम करने वाली बाई की पायल की आवाज़।
"सुमित, आज खाने की मेज़ पर कोई नहीं आया?" शारदा जी ने एक शाम दबे स्वर में पूछा।
"माँ, सबको भूख अलग-अलग समय पर लगती है। रीना ने अपना सलाद कमरे में मँगा लिया है और बच्चे अभी गेम खेल रहे हैं। आप खा लीजिए, खाना गरम रखने के लिए माइक्रोवेव है ही," सुमित ने बिना नज़रें ऊपर उठाए अपने लैपटॉप पर टाइप करते हुए कहा।
शारदा जी ने अपनी थाली की ओर देखा। खाना शानदार था, पर उसका स्वाद फीका लग रहा था। पुराने घर में जब सब्ज़ी में नमक कम होता था, तो शोर मचता था, बहस होती थी—वो शोर भी एक तरह का जीवित अहसास था। यहाँ तो सब कुछ इतना शांत था कि उन्हें खुद की साँसों की आवाज़ से डर लगने लगा था।
रात को जब वो अपने कमरे में जातीं, तो वो 'स्मार्ट लाइट्स' उनके चेहरे की उदासी को और ज़ोर से चमका देतीं। उन्हें महसूस हुआ कि बड़े घरों में आवाज़ें गूँजती तो हैं, पर पहुँचती कहीं नहीं।
एक दिन, शारदा जी की तबीयत अचानक बिगड़ गई। उन्हें चक्कर आया और वो गैलरी में ही गिर पड़ीं। घर इतना बड़ा था और दीवारें इतनी 'साउंड-प्रूफ' थीं कि किसी को उनकी आवाज़ ही नहीं सुनाई दी। आधे घंटे बाद जब रीना अपने कमरे से जूस लेने निकली, तब उसने शारदा जी को ज़मीन पर पड़ा देखा।
अस्पताल में डॉक्टर ने सब चेकअप करने के बाद सुमित से कहा, "शारीरिक रूप से तो कमजोरी है ही, पर ऐसा लग रहा है जैसे इनका मन कहीं बहुत पीछे छूट गया है। इन्हें विटामिन की दवाइयों से ज़्यादा ताज़ी हवा और अपनों के साथ की ज़रूरत है।"
सुमित चुप था। उसने अपनी पूरी जमापूंजी लगा दी थी अपनी माँ को 'आराम' देने के लिए। उसने सबसे महँगा एयर-प्यूरीफायर लगवाया था ताकि माँ को 'ताज़ी हवा' मिले। पर डॉक्टर की बात ने उसे झकझोर दिया।
घर लौटते वक्त गाड़ी में सन्नाटा था। शारदा जी खिड़की से बाहर डूबते सूरज को देख रही थीं। सुमित ने पहली बार गौर किया कि उसकी माँ की आँखों में वो चमक नहीं थी जो पुराने जर्जर घर में हुआ करती थी।
"माँ, आप कुछ कह क्यों नहीं रहीं?" सुमित ने भारी आवाज़ में पूछा।
शारदा जी ने उसकी ओर देखा और उसके हाथ पर अपना कांपता हुआ हाथ रखा। "बेटा, घर में चीज़ें तो बहुत हैं, पर उन चीज़ों के बीच हम कहीं खो गए हैं। मुझे उस ठंडी मशीन (एसी) से डर लगता है। मुझे वो पुराने नीम की कड़वाहट याद आती है, जो शाम को मीठी छाँव देती थी।"
सुमित को अपनी गलती का अहसास होने लगा था। उसने घर तो 'स्मार्ट' बना लिया था, पर वो 'संवेदना' भूल गया था।
अध्याय 5: कंक्रीट में दरार और उम्मीद की कोंपल
अगले कुछ दिन सुमित के लिए आत्ममंथन के थे। वह ऑफिस तो जाता, पर उसका मन घर के उन कोनों में अटका रहता जहाँ उसकी माँ की खामोशी चीख रही थी। उसने गौर किया कि माँ अब अपने आलीशान कमरे में कम और घर की दहलीज पर ज़्यादा समय बिताती थीं, जैसे किसी खोई हुई चीज़ का इंतज़ार कर रही हों।
रविवार की सुबह, सुमित ने आर्किटेक्ट को वापस बुलाया।
"सर, अब क्या बदलाव चाहिए? इंटीरियर तो पूरा हो चुका है," आर्किटेक्ट ने हैरान होकर पूछा।
सुमित ने पार्किंग के उस हिस्से की तरफ इशारा किया जहाँ उसकी काली एसयूवी खड़ी थी। "इस हिस्से की टाइल्स उखाड़ दो। मुझे यहाँ फिर से मिट्टी चाहिए।"
रीना और आर्किटेक्ट दोनों दंग रह गए। "सुमित, तुम पागल हो गए हो? यहाँ गाड़ी खड़ी होती है, और मिट्टी होगी तो कीचड़ होगा, घर गंदा होगा," रीना ने विरोध किया।
सुमित ने शांति से कहा, "रीना, घर गंदा होगा तो साफ हो जाएगा, पर अगर माँ का मन मैला होकर बुझ गया, तो वो कभी साफ नहीं होगा। मुझे यहाँ एक छोटा सा खुला आँगन चाहिए। ऊपर की छत का एक हिस्सा काटकर जाली लगवाओ, ताकि बारिश की बूंदें और असली धूप सीधे ज़मीन पर गिर सकें।"
अगले पंद्रह दिनों तक घर में फिर से तोड़-फोड़ हुई। इस बार कुछ 'बन' नहीं रहा था, बल्कि कुछ 'हटाया' जा रहा था ताकि ज़िंदगी अंदर आ सके। सुमित ने खुद जाकर एक नर्सरी से नीम का एक बड़ा पौधा खरीदा। उसने उसे उसी जगह लगाया जहाँ पुराने नीम की जड़ें कभी हुआ करती थीं।
जिस दिन आँगन तैयार हुआ, सुमित अपनी माँ का हाथ पकड़कर उन्हें बाहर लाया।
शारदा जी ने देखा कि कंक्रीट के उस आलीशान जंगल के बीच एक छोटा सा कच्चा कोना उभर आया था। ऊपर आसमान खुला था और दोपहर की सुनहरी धूप सीधे उस कच्ची मिट्टी पर नाच रही थी। सुमित ने वहां एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी डाल दी थी।
"माँ, यहाँ कोई एसी नहीं है, कोई साउंड-प्रूफ काँच नहीं है। यहाँ धूल भी आएगी और चिड़ियाँ भी। अब आप यहाँ बैठ सकती हैं," सुमित ने धीरे से कहा।
शारदा जी ने कांपते हाथों से उस नीम के पौधे को छुआ। मिट्टी की वही पुरानी सोंधी महक उनकी नसों में दौड़ गई। उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं और अपना चेहरा ऊपर की ओर कर लिया। धूप का एक गर्म टुकड़ा उनके माथे पर आकर ठहर गया।
बरसों बाद शारदा जी के चेहरे पर वह सुकून वाली मुस्कान आई, जो किसी दवा या टीवी से नहीं आ सकती थी।
"बेटा, तूने घर को छोटा कर दिया, पर मेरी दुनिया बड़ी कर दी," शारदा जी ने भर्राई आवाज़ में कहा।
उस शाम, पहली बार पूरा परिवार उस छोटे से कच्चे आँगन में बैठा। रीना ने रसोई से पकौड़े बनाए थे और बच्चे मिट्टी में उंगलियाँ चला रहे थे। घर बड़ा था, पर अब वे सब एक 'धूप के टुकड़े' के नीचे सिमट आए थे। सुमित को समझ आ गया था कि तरक्की का मतलब पुरानी जड़ों को उखाड़ना नहीं, बल्कि उन जड़ों के लिए नया आसमान ढूँढना है।
— समाप्त —
Written by khamosh_kalam(palak)
पूरी कहानी पढ़कर लगा, ये सिर्फ एक घर के बनने-बिगड़ने की कहानी नहीं है… इसमें कहीं न कहीं हम सबके घरों और उनसे जुड़ी छोटी-छोटी यादों की भी झलक है। शुरुआत में लगा कि पुराना घर टूट रहा है, लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि असल में रिश्तों के बीच की जगह भी छोटी होती जा रही थी। अच्छा लगा कि अंत में सुमित ने पुराने घर को वापस बनाने की कोशिश नहीं की, बल्कि नए घर में उन जड़ों के लिए जगह बनाई। शायद घर को घर बनाए रखने के लिए बहुत कुछ नहीं चाहिए—बस थोड़ी धूप, थोड़ी मिट्टी और अपनों के लिए थोड़ा-सा मन।
ReplyDeleteएक बात और अच्छी लगी—कहानी ने आधुनिकता को खलनायक नहीं बनाया, बल्कि यह याद दिलाया कि तरक्की करते हुए अपनी जड़ों के लिए जगह बचाए रखना भी उतना ही ज़रूरी है।
हम घर को Smart बना देते हैं, पर संवेदना भूल जाते हैं।
ReplyDeleteकभी-कभी तरक्की का मतलब नई ईंटें जोड़ना नहीं,
पुरानी जड़ों के लिए नया आसमान ढूंढना होता है।
ये सारी लाइन्स का मतलब कहानी के दूसरे अध्याय में समझ आया।
और अब जाकर असली मतलब समझ आया - धूप का टुकड़ा