पुराना स्वेटर
अध्याय 1: संदूक की खामोशी बरसात की वह दोपहर वैसी ही थी जैसी माँ को पसंद थी—धुंधली, नम और सोंधी मिट्टी की खुशबू से भरी। माँ को गुज़रे तीन साल बीत चुके थे, पर घर के उस पिछले कमरे में अब भी उनकी मौजूदगी की एक भारी गंध बसी थी। वह कमरा, जिसे हम सबने 'स्टोर रूम' का नाम दे दिया था, असल में माँ की यादों का कब्रिस्तान था। मैंने भारी मन से वह पुरानी कुंडी खोली। कमरे के भीतर की हवा ठहरी हुई थी। धूल के ज़र्रे रोशनदान से आती सूरज की एक पतली सी किरण में नाच रहे थे। कोने में रखा था वह बड़ा सा लोहे का संदूक। वह संदूक, जिसे माँ हमेशा ताला लगाकर रखती थीं, जैसे उसमें उनके जीवन का कोई बहुत बड़ा राज़ दफ़न हो। ताला खोलने पर जो चरमराहट हुई, वह सन्नाटे में किसी चीख की तरह गूँजी। ऊपर कुछ पुरानी साड़ियाँ थीं—वही सूती साड़ियाँ जिन्हें पहनकर माँ रसोई में घंटों पसीना बहाया करती थीं। उन्हें छूते ही उनकी हथेलियों का खुरदरापन महसूस हुआ। साड़ियों के नीचे, सबसे तह में, मलमल के एक सफेद कपड़े में लिपटा हुआ कुछ भारी सा रखा था। मैंने उसे बाहर निकाला। वह एक स्वेटर था। गहरा नीला, जैसे रात का आकाश होता है। पर वह अधूरा था। उसकी ...