धूप का टुकड़ा (भाग 2)
This story continue after Part 1..... click here to read previous part.... अध्याय 4: दीवारें बड़ी, दिल छोटे नए घर की भव्यता के साथ-साथ घर के सदस्यों के बीच की दूरियां भी जैसे नक्शे के हिसाब से बढ़ गई थीं। पुराने घर में एक ही बड़ा कमरा था जहाँ सब बैठते थे, एक ही मेज़ थी जहाँ सब साथ खाना खाते थे। वहाँ छुपने की जगह नहीं थी, इसलिए झगड़े भी होते तो सुलह भी वहीं आँगन में हो जाती थी। पर इस नए 'विला' में हर किसी का अपना 'प्राइवेट स्पेस' था। सुमित अपने होम-ऑफिस में बंद रहता, रीना अपने आलीशान बेडरूम में वेब-सीरीज़ देखती, और बच्चे अपने प्ले-स्टेशन की आभासी दुनिया में खोए रहते। शारदा जी अक्सर हॉल में सोफे पर बैठी रहतीं, यह इंतज़ार करते हुए कि कोई गुज़रे और उनसे दो बातें करे। पर वहां सिर्फ सन्नाटा गुज़रता था, या कभी-कभार काम करने वाली बाई की पायल की आवाज़। "सुमित, आज खाने की मेज़ पर कोई नहीं आया?" शारदा जी ने एक शाम दबे स्वर में पूछा। "माँ, सबको भूख अलग-अलग समय पर लगती है। रीना ने अपना सलाद कमरे में मँगा लिया है और बच्चे अभी गेम खेल रहे हैं। आप खा लीजिए...