आधा कप चाय
अध्याय 1: दो प्याले, एक सन्नाटा
जगन बाबू के घर में घड़ी की 'टिक-टिक' भी किसी हथौड़े की तरह सुनाई देती थी। रिटायरमेंट के पाँच साल बाद, उनके जीवन का भूगोल महज़ तीन कमरों और एक बालकनी में सिमट गया था। सुबह छह बजे जब अलार्म बजता, तो वह सिर्फ़ समय बताने के लिए नहीं, बल्कि यह याद दिलाने के लिए होता कि एक और लंबा दिन काटने की चुनौती सामने खड़ी है।
रसोई में जाकर स्टोव जलाना उनकी दिनचर्या का सबसे पहला और सबसे पवित्र हिस्सा था। वह पुराने पीतल के बर्तन में पानी चढ़ाते, अदरक कूटते और फिर बड़ी सावधानी से चाय की पत्ती डालते। जब चाय खौलने लगती और उसकी खुशबू पूरे घर में फैल जाती, तब कुछ पलों के लिए उन्हें लगता कि सब कुछ पहले जैसा ही है।
वह सिर्फ़ अपने लिए चाय नहीं बनाते थे। वह हमेशा दो कप चाय बनाते थे।
पुराने चीनी मिट्टी के दो कप, जिन पर नीले फूलों के बेल-बूटे बने थे। एक कप अपने लिए और दूसरा कप मेज़ की उस तरफ, जहाँ कभी मालती बैठा करती थी।
"आज अदरक थोड़ी ज़्यादा कूट दी है, तुम्हें तीखी चाय पसंद थी न?" जगन बाबू खाली कुर्सी की ओर देखकर बुदबुदाए।
वहाँ से कोई जवाब नहीं आया। सिर्फ़ पंखे की घरघराहट और बाहर सड़क पर गुज़रती किसी गाड़ी का शोर सुनाई दिया। पर जगन बाबू के लिए वह खामोशी ही मालती का जवाब थी। वह उस खाली कप से उठती भाप को देखते रहते, जैसे उस धुएँ में उन्हें मालती का चेहरा दिख रहा हो।
लोग कहते थे कि जगन बाबू का मानसिक संतुलन शायद डगमगा गया है। उनके बेटे ने शहर ले जाने की बहुत ज़िद की, पर जगन बाबू ने मना कर दिया। "वहाँ की चाय में वह स्वाद नहीं आएगा बेटा," उन्होंने बस इतना ही कहा था। पर असल बात स्वाद की नहीं, उस 'आधे कप' की थी।
उन्हें डर था कि अगर वह उस घर को छोड़ देंगे, तो मालती की वह बची हुई चाय ठंडी पड़ जाएगी। वह आधा कप चाय दरअसल उनकी तन्हाई का इलाज थी। वह उस कप के बहाने मालती से दिन भर की बातें कर लेते—
चाय का वह दूसरा कप कभी खाली नहीं होता था। वह अंत में सिंक में उड़ेल दिया जाता था। पर उन पंद्रह मिनटों के लिए, जब तक कप से भाप उठती रहती, जगन बाबू अकेले नहीं होते थे।
एक दिन, जब वह चाय पी रहे थे, उनके हाथ काँप गए। कप मेज़ पर रखते वक्त थोड़ा सा छलक गया। उन्होंने अपनी थरथराती उंगलियों को देखा और फिर मालती के उस आधे भरे कप को। पहली बार उन्हें डर लगा। अगर कल उनका हाथ और ज़्यादा काँपा, तो क्या वह चाय बना पाएंगे? और अगर चाय नहीं बनी, तो क्या मालती फिर कभी उस मेज़ पर नहीं आएगी?
अकेलापन तब तक डरावना नहीं होता जब तक आपके पास कोई भ्रम पालने की ताक़त हो। उस दिन जगन बाबू को लगा कि उनका भ्रम धीरे-धीरे धुंधला पड़ रहा है।
अध्याय 2: पुरानी कड़वाहट और नई मिठास
जगन बाबू ने अपनी चाय का एक घूँट भरा। वह अब भी वैसी ही थी—थोड़ी तेज़, थोड़ी कड़क। मालती हमेशा कहती थी, "जगन, तुम चाय नहीं, काढ़ा बनाते हो। थोड़ी शक्कर और डालो, ज़िंदगी में कड़वाहट कम है क्या जो ज़बान को भी चैन नहीं लेने देते?"
वह याद आते ही जगन बाबू के होंठों पर एक फीकी मुस्कान तैर गई। आज से चालीस साल पहले की वह शाम उनकी आँखों के सामने ताज़ा हो गई, जब वह इस घर में नए-नए आए थे। तब यह घर सन्नाटे से नहीं, बल्कि मालती की पायल की खनक और उनकी छोटी-मोटी नोक-झोंक से गूँजता था।
"तुम्हें याद है मालती?" उन्होंने खाली कुर्सी की तरफ देखते हुए कहा, "हमारी पहली लड़ाई भी इसी चाय पर हुई थी।"
उस दिन जगन बाबू दफ़्तर से थके-हारे लौटे थे। नया प्रमोशन मिला था और साथ में काम का भारी बोझ। मालती ने बड़े चाव से चाय बनाई थी, पर जगन बाबू ने पहला घूँट लेते ही कप मेज़ पर पटक दिया था। "इतनी मीठी चाय? ज़हर पिला रही हो क्या?" वह चिल्लाए थे।
मालती ने उस दिन पलटकर जवाब नहीं दिया था। वह चुपचाप रसोई में चली गई थी और पूरी रात उनसे बात नहीं की थी। अगले दिन सुबह जब जगन बाबू की आँख खुली, तो सिरहाने पर चाय का कप रखा था। पहला घूँट भरते ही जगन बाबू ठिठक गए। चाय में चीनी बिल्कुल नहीं थी—वह कड़वी थी, ठीक वैसी ही जैसा उनका कल का व्यवहार था।
कप के नीचे एक छोटा सा काग़ज़ का टुकड़ा दबा था, जिस पर मालती की लिखावट थी: "मिठास की कद्र तभी होती है जब स्वाद कड़वा हो जाए। कल की चाय मीठी नहीं थी, उसमें मेरी दिन भर की थकान और तुम्हारे आने की खुशी घुली थी।"
जगन बाबू को आज वह काग़ज़ का टुकड़ा अपनी छाती के किसी कोने में चुभता हुआ महसूस हुआ। हम अक्सर अपनों की दी हुई मिठास को 'ज़्यादा' समझकर ठुकरा देते हैं, और फिर एक दिन उसी मिठास की एक बूंद के लिए तरस जाते हैं।
जैसे-जैसे साल बीते, चाय उनके रिश्ते का एक पैमाना बन गई। जब जगन बाबू खुश होते, तो मालती चाय में इलायची कूटकर डालती। जब घर में तनाव होता, तो चाय में काली मिर्च का तीखापन बढ़ जाता। और जब कभी सुलह होती, तो दोनों के कपों से उठती भाप कमरे की सारी दूरियाँ मिटा देती।
अब जगन बाबू के हाथ में कप ठंडा हो चुका था। उन्होंने देखा कि मालती के कप की भाप भी अब शांत हो चुकी थी। उन्होंने अपनी चाय ख़त्म की और मेज़ की दूसरी तरफ रखे उस 'आधे कप' को उठाया। वह चाय अब ठंडी और बेजान थी।
तभी फोन की घंटी बजी। उनके बेटे का फोन था। जगन बाबू ने भारी मन से फोन उठाया।
"बाबूजी, आप मान क्यों नहीं जाते? अकेले कब तक रहेंगे वहाँ? शहर आ जाइए, यहाँ पास में ही एक क्लब है, आपके जैसे कई बुजुर्ग आते हैं, चाय-वाय पीते हैं, गप्पें मारते हैं। आपका मन लगा रहेगा," बेटे की आवाज़ में वही पुरानी व्यावहारिक चिंता थी।
"मन कहाँ लगा रहेगा बेटा?" जगन बाबू ने धीमे से कहा, "वहाँ के क्लब में चाय तो मिल जाएगी, पर वो खाली कुर्सी नहीं मिलेगी जिस पर तुम्हारी माँ बैठती है। वहाँ भीड़ तो होगी, पर वह सन्नाटा नहीं होगा जिसमें मैं उसे सुन पाता हूँ।"
बेटे ने उसाँस भरी और फोन काट दिया। उसे लगा जगन बाबू सनक गए हैं। पर जगन बाबू जानते थे कि वह सनके नहीं हैं; वह तो बस एक अधूरे संवाद को पूरा करने की कोशिश कर रहे थे, जो मालती के जाने के साथ अचानक बीच में ही टूट गया था।
उन्होंने सिंक में जाकर मालती वाली चाय उड़ेल दी। सिंक की जाली पर अदरक के कुछ टुकड़े और चाय की पत्ती चिपक गई थी। जगन बाबू उसे साफ करने लगे, पर उनकी धुंधली आँखों को आज वह गंदगी नहीं, बल्कि मालती के हाथों की वह आख़िरी छुअन याद आ रही थी।
क्या सच में इंसान यादों के सहारे जी सकता है? या फिर ये यादें ही हैं जो इंसान को धीरे-धीरे अंदर से खोखला कर देती हैं?
अध्याय 3: स्मृतियों का बँटवारा
दो दिन बाद, जगन बाबू के घर के बाहर एक गाड़ी रुकी। उनका बेटा, अर्णव, शहर से आया था। उसके आने से घर के उस भारी सन्नाटे में एक अजीब सी हलचल मच गई। अर्णव अपने साथ कुछ खाली गत्ते के डिब्बे लाया था। जगन बाबू बालकनी से उसे देखते रहे—वह डिब्बे सिर्फ़ कागज़ के नहीं थे, वे जगन बाबू की बची-कुची दुनिया को समेटने का सामान थे।
"बाबूजी, अब बहुत हुआ," अर्णव ने हॉल में घुसते ही कहा। उसकी आवाज़ में वह आधुनिक तेज़ी थी जिसे भावनाओं से ज़्यादा वक्त की कीमत पता होती है। "मैंने यहाँ की अलमारी और माँ का सामान खाली करने के लिए कुछ लोगों को बुलाया है। जो ज़रूरी है वो हम ले चलेंगे, बाकी किसी एनजीओ (NGO) को दे देंगे। इस घर को अब रेंट पर चढ़ा देना चाहिए, खाली रहने से सीलन पकड़ रहा है।"
जगन बाबू की उंगलियाँ सोफे के हत्थे पर कस गईं। सीलन? उन्हें लगा जैसे अर्णव उनके जख्मों की बात कर रहा है। वह चुपचाप रसोई की ओर चले गए। उनकी शरणस्थली अब वही एक कमरा बचा था।
अर्णव अलमारी के पास पहुँचा। जैसे ही उसने माँ की अलमारी का दरवाज़ा खोला, पुराने कपड़ों और कपूर की वह मिली-जुली गंध पूरे कमरे में फैल गई। अर्णव साड़ियाँ निकालने लगा। वह उन्हें बड़ी कुशलता से तह कर रहा था, जैसे वह कोई सामान हो।
"ये सब क्यों कर रहे हो बेटा?" जगन बाबू ने रसोई की चौखट पर खड़े होकर पूछा। उनकी आवाज़ में थरथराहट थी।
"मम्मी को गए दो साल हो गए बाबूजी। अब इन चीज़ों को सँभाल कर रखने का क्या फायदा? इन्हें किसी ज़रूरतमंद को देंगे तो दुआएँ मिलेंगी।" अर्णव ने एक सिल्क की साड़ी डिब्बे में डालते हुए कहा।
जगन बाबू को लगा जैसे कोई उनके शरीर का एक-एक अंग काटकर डिब्बों में भर रहा है। वह साड़ी मालती ने उनकी पच्चीसवीं सालगिरह पर पहनी थी। उस पर चाय का एक छोटा सा दाग भी था, जिसे छुपाने के लिए मालती हमेशा पल्लू को घुमाकर लेती थी। अर्णव के लिए वह सिर्फ़ 'कपड़ा' था, पर जगन बाबू के लिए वह एक पूरी शाम थी जो उस साड़ी के रेशों में आज भी कैद थी।
"अर्णव, रुक जाओ..." जगन बाबू की आवाज़ इस बार थोड़ी सख्त थी।
अर्णव रुका, हाथ में मालती का एक पुराना ब्लाउज पकड़े हुए। "बाबूजी, इमोशनल मत होइए। लाइफ मूव-ऑन करने का नाम है।"
जगन बाबू कुछ नहीं बोले। वह रसोई में गए और फिर से चाय का पानी चढ़ा दिया। बर्तन के टकराने की आवाज़ ने अर्णव का ध्यान खींचा। वह रसोई के दरवाज़े पर आया और देखा कि उसके पिता दो कपों में चाय छान रहे थे।
"फिर वही दो कप?" अर्णव ने झुंझलाकर कहा। "डॉक्टर ने कहा था कि आपको ये सब छोड़ना होगा। ये 'फैंटम' की तरह जीना बंद कीजिये। मम्मी नहीं हैं यहाँ।"
जगन बाबू ने चाय का एक कप अर्णव की ओर बढ़ाया। "आज ये दूसरा कप तुम्हारे लिए है अर्णव। बैठो।"
अर्णव थोड़ा हिचकिचाया, पर पिता का चेहरा देखकर बैठ गया। उसने चाय का एक घूँट भरा और चेहरा सिकोड़ लिया। "बहुत कड़वी है बाबूजी। शक्कर बिल्कुल नहीं है?"
जगन बाबू ने अपनी चाय की ओर देखा। "शक्कर तो तुम्हारी मम्मी के साथ ही चली गई बेटा। पर कड़वाहट को भी तो पीना आना चाहिए। तुम सामान बाँट रहे हो, साड़ियाँ बाँट रहे हो, पर क्या तुम वो यादें भी बाँट पाओगे जो इन दीवारों में चिपकी हैं? तुम इस घर को रेंट पर चढ़ा दोगे, पर उस रेंटर से कह पाओगे कि हर सुबह यहाँ दो कप चाय बनाना ज़रूरी है?"
अर्णव चुप हो गया। उसे पहली बार अहसास हुआ कि उसके पिता जिस 'पागलपन' में जी रहे थे, वह दरअसल उनका जीने का सहारा था। वह साड़ियाँ हटा सकता था, पर वह उस 'एहसास' को कैसे हटाता जो चाय की भाप बनकर हर सुबह इस घर को ज़िंदा रखता था?
जगन बाबू ने मालती वाले कप को मेज़ के उस कोने पर खिसका दिया जहाँ अर्णव बैठा था। "जिस दिन तुम इस चाय की कड़वाहट समझ जाओगे, उस दिन तुम्हें इन डिब्बों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।"
अर्णव ने अपनी नज़रें झुका लीं। उसके हाथ में वह चाय का कप अब भारी लगने लगा था। वह 'आधा कप चाय' आज एक सवाल बन गई थी—कि क्या हम अपनों को उनकी चीज़ों में याद रखते हैं, या उनकी आदतों में?
अध्याय 4: संदूक का गुप्त कोना
अर्णव अगले दिन सुबह जल्दी निकल गया। उसने सारे गत्ते के डिब्बे अपनी गाड़ी में लाद लिए थे, पर जाते-जाते एक छोटा सा पुराना मखमली बैग मेज़ पर छोड़ गया। "बाबूजी, यह मम्मी के व्यक्तिगत सामान वाले दराज़ में था। मुझे लगा शायद आप इसे पास रखना चाहें," उसने खिड़की से हाथ हिलाते हुए कहा और धूल उड़ाता हुआ चला गया।
घर फिर से शांत हो गया। पर यह शांति पहले वाली नहीं थी। आज घर में एक खालीपन था, जैसे अलमारी से साड़ियाँ क्या गईं, घर की दीवारें नंगी हो गई हों।
जगन बाबू ने रसोई में जाकर चाय चढ़ाई। आज उनका मन बहुत भारी था। चाय छानते वक्त उनके हाथ पहले से ज़्यादा काँप रहे थे। उन्होंने दो कप मेज़ पर रखे, पर आज मालती वाले कप की तरफ देखने की उनकी हिम्मत नहीं हो रही थी। उन्हें लग रहा था जैसे उन्होंने मालती के साथ धोखा किया है, उसके वजूद को डिब्बों में बंद करके विदा कर दिया है।
उनकी नज़र उस मखमली बैग पर पड़ी। उन्होंने कांपते हाथों से उसकी डोरी खींची। अंदर से कुछ पुराने बिल, सूखे हुए गुलाब की पंखुड़ियाँ और एक डायरी निकली। यह डायरी वैसी नहीं थी जिसमें घर का हिसाब लिखा जाता था। यह डायरी माँ ने जगन बाबू के नाम लिखी थी।
पहला पन्ना पलटते ही जगन बाबू की आँखों के आगे धुंध छा गई। वहां लिखा था:
"जगन, जिस दिन तुम यह पढ़ोगे, शायद मैं उस कुर्सी के दूसरी तरफ नहीं होऊँगी। तुम सोच रहे होगे कि मैं चली गई, पर सच तो यह है कि मैं कभी गई ही नहीं। मैं तो उस हर एक प्याले में हूँ जो तुमने मेरे साथ पिया, और उस हर एक कड़वाहट में हूँ जो तुमने मेरे बाद पी।"
जगन बाबू की सिसकी निकल गई। उन्होंने चाय का प्याला हाथ में लिया, पर आज उसका स्वाद कड़वा नहीं, बल्कि नमकीन लग रहा था—उनके अपने आँसुओं की तरह।
डायरी के बीच में एक छोटा सा लिफाफा था। उसमें एक और चाय की पत्ती का छोटा सा पैकेट था और एक नोट:
"यह उस खास चाय की पत्ती है जो हम दार्जिलिंग से लाए थे। इसे तब बनाना जब तुम्हें लगे कि सन्नाटा बहुत गहरा हो गया है। और याद रखना, चाय का दूसरा कप इसलिए खाली नहीं होता कि मैं नहीं हूँ, बल्कि इसलिए होता है ताकि तुम उसमें अपनी यादें भर सको।"
जगन बाबू ने उस लिफाफे को अपने सीने से लगा लिया। उन्हें पहली बार अहसास हुआ कि 'आधा कप चाय' का मतलब अधूरापन नहीं था। वह तो एक वादा था—यह वादा कि जब तक जगन बाबू ज़िंदा हैं, मालती का हिस्सा इस घर में सुरक्षित है।
उन्होंने मालती वाले कप की ओर देखा। आज उन्हें वहां उदासी नहीं दिखी। उन्हें लगा जैसे मालती मुस्कुरा रही है और कह रही है— "चाय ठंडी हो रही है जगन, पी लो।"
जगन बाबू ने उस दिन अपनी चाय का पूरा आनंद लिया। उन्होंने महसूस किया कि अर्णव साड़ियाँ ले जा सकता था, पर वह उस महक को नहीं ले जा सका जो इस घर की ईंट-ईंट में रची-बसी थी।
शाम होते-होते जगन बाबू ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अलमारी के उस खाली खाने में मालती की डायरी और वह मखमली बैग रख दिया। उन्होंने खुद से कहा कि कल सुबह वह दो कप चाय नहीं बनाएंगे।
कल सुबह वह 'एक ही साथ' दो लोगों के लिए चाय बनाएंगे। अब वह प्याला खाली नहीं रहेगा, वह उनकी बातों, उनकी यादों और मालती के उसी पुराने प्यार से भरा होगा।
अध्याय 5: मासूम जिज्ञासा
अगली सुबह जब जगन बाबू रसोई में अदरक कूट रहे थे, तो बाहर वाले दरवाज़े पर एक हल्की सी खटखट हुई। आमतौर पर इस वक्त दूधवाला आता था, पर आज की दस्तक में एक अलग ही हिचकिचाहट थी। जगन बाबू ने हाथ पोंछे और दरवाज़ा खोला। सामने पड़ोस में रहने वाला सात साल का चिक्कू खड़ा था, हाथ में एक खाली कांच की बरनी लिए।
"दादू, मम्मी ने पूछा है कि क्या आपके पास थोड़ी सी चीनी मिलेगी? हमारे यहाँ ख़त्म हो गई है और चाय चढ़ी हुई है," चिक्कू ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से ऊपर देखते हुए पूछा।
जगन बाबू मुस्कुराए। चीनी? जो चीज़ उनके घर में सबसे कम इस्तेमाल होती थी, आज उसी की फरमाइश हुई थी। "आओ अंदर आओ बेटा, देखता हूँ।"
चिक्कू पहली बार उस घर के अंदर आया था। वह कौतूहल से दीवारों पर टंगी पुरानी तस्वीरों और मेज़ पर रखे उन दो कपों को देखने लगा। जगन बाबू रसोई से चीनी ढूँढने लगे, तभी पीछे से चिक्कू की आवाज़ आई।
"दादू, आप दो कप चाय क्यों पीते हो? आपके साथ तो कोई भी नहीं बैठा।"
जगन बाबू के हाथ रुक गए। जो सवाल अर्णव ने गुस्से में पूछा था, वही सवाल चिक्कू ने मासूमियत से पूछ लिया था। वह रसोई से बाहर आए और चिक्कू के पास बैठ गए। "बेटा, यहाँ कोई बैठा तो नहीं है, पर तुम्हें पता है? कभी-कभी जो लोग नहीं दिखते, वो हमारे सबसे करीब होते हैं।"
चिक्कू ने अपना सिर तिरछा किया, जैसे कुछ समझने की कोशिश कर रहा हो। "जैसे सुपरमैन? जो दिखता नहीं पर सबको बचा लेता है?"
जगन बाबू खिलखिलाकर हँस पड़े। अरसे बाद उनके घर में ऐसी आवाज़ गूँजी थी। "हाँ बेटा, बिल्कुल सुपरमैन की तरह। ये दूसरा कप मेरी सुपरवुमन के लिए है। वो यहाँ नहीं है, पर वो इस चाय की खुशबू से आ जाती है।"
चिक्कू मेज़ के करीब गया और उस खाली कप को गौर से देखा। "पर दादू, सुपरमैन तो स्ट्रॉन्ग होता है। आपकी सुपरवुमन तो चाय भी नहीं पी रही, देखो कप तो भरा हुआ है।"
जगन बाबू निरुत्तर थे। बच्चे की सादगी ने उनके उस भ्रम की परतें उधेड़ दी थीं जिसे वह बड़े जतन से सँभाले हुए थे। चिक्कू ने अपनी जेब से एक छोटी सी टॉफी निकाली और उसे उस खाली कप के पास रख दिया। "दादू, मम्मी कहती हैं कड़वी चाय पीने से मुँह गंदा हो जाता है। आप ये टॉफी उस सुपरवुमन को दे देना, शायद वो चाय पी ले।"
जगन बाबू का गला भर आया। उन्होंने चिक्कू की बरनी में चीनी भरी और उसे दरवाज़े तक छोड़ने गए। चिक्कू तो उछलता हुआ चला गया, पर वह घर में एक नई ताज़गी छोड़ गया था।
जगन बाबू वापस मेज़ पर आए। उन्होंने उस टॉफी को देखा और फिर मालती के कप को। पहली बार उन्हें अहसास हुआ कि सन्नाटा सिर्फ़ यादों से नहीं, बल्कि नई ज़िंदगी से भी भरा जा सकता है। उन्होंने उस दिन वह 'आधा कप चाय' सिंक में नहीं डाली। उन्होंने वह कप उठाया और बालकनी में लगे उस चमेली के पौधे में डाल दिया जिसे मालती ने बड़े शौक से लगाया था।
"आज तुम्हारी चाय मिट्टी में मिल गई मालती, पर देखो... चिक्कू ने तुम्हारे लिए टॉफी भेजी है," उन्होंने बालकनी से आसमान को देखते हुए कहा।
आज की चाय में कड़वाहट कम थी। शायद चिक्कू की मासूमियत ने उनके मन की कड़वाहट को थोड़ा सा सोख लिया था। जगन बाबू को समझ आ रहा था कि यादों का बोझ ढोने से बेहतर है, उन यादों को किसी और के साथ मुस्कुराकर बाँटना।
अध्याय 6: महक की नई मंज़िल
अगली सुबह जगन बाबू जब जगे, तो उनके मन में एक अजीब सी स्फूर्ति थी। चिक्कू की उस छोटी सी टॉफी ने जैसे उनके भीतर के किसी बंद दरवाज़े को धक्का दे दिया था। उन्होंने रसोई में कदम रखा, पर आज उनकी नज़रें उस खाली कुर्सी को ढूँढकर उदास नहीं हुईं। आज उन्होंने चाय का पानी चढ़ाया और उसमें अदरक के साथ-साथ एक इलायची भी कूटकर डाली—मालती की पसंदीदा खुशबू।
शाम को जब पार्क में बच्चों के शोर की आवाज़ें आईं, तो जगन बाबू ने अपनी पुरानी केतली निकाली। उन्होंने आज सिर्फ़ दो कप नहीं, बल्कि पूरी केतली भरकर चाय बनाई। साथ में बिस्कुट का एक नया डिब्बा खोला।
वह बालकनी में आए और चिक्कू को आवाज़ दी, "चिक्कू! अपनी मम्मी से पूछकर क्या तुम और तुम्हारे दोस्त यहाँ आ सकते हो? आज मेरे पास एक जादुई कहानी है।"
कुछ ही देर में चिक्कू अपने दो दोस्तों के साथ जगन बाबू के ड्राइंग रूम में था। वह कमरा, जो कभी यादों के बोझ से भारी रहता था, अब बच्चों की चहचहाहट से गूँज रहा था। जगन बाबू ने छोटे-छोटे गिलासों में चाय (दूध ज़्यादा डालकर) और बिस्कुट परोसे।
"दादू, आज कौन सी कहानी सुनाओगे? सुपरवुमन वाली?" चिक्कू ने बिस्कुट डुबोते हुए पूछा।
जगन बाबू मुस्कुराए। उन्होंने मालती की उस नीली डायरी से एक छोटी सी घटना सुनाई—कैसे एक बार मालती ने एक चिड़िया के बच्चे को बचाया था। बच्चे मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे। जगन बाबू को महसूस हुआ कि कहानियाँ सुनाते वक्त वह मालती के और करीब आ गए हैं। मालती अब सिर्फ़ उस ठंडे हो रहे चाय के प्याले में नहीं थी, वह उन बच्चों की चमकती आँखों में और उनकी हंसी में थी।
जैसे-जैसे दिन बीतते गए, जगन बाबू का घर 'कहानी वाला घर' बन गया। शाम की वह चाय अब तन्हाई का मातम नहीं, बल्कि मोहल्ले के बच्चों के लिए एक उत्सव बन गई थी। मोहल्ले की औरतें भी कभी-कभी चाय की पत्ती या चीनी देने के बहाने आतीं और जगन बाबू से उनके ज़माने की बातें सुनतीं।
जगन बाबू ने महसूस किया कि उन्होंने मालती को खोया नहीं है, बल्कि उसे विस्तार दे दिया है। वह 'आधा कप चाय' अब सैकड़ों छोटे-छोटे घूँटों में बँट गई थी।
एक दिन अर्णव का फोन आया। "बाबूजी, कैसे हैं आप? वो घर बेचने या रेंट पर देने की बात..."
जगन बाबू ने उसे बीच में ही काट दिया। उनकी आवाज़ में एक नई खनक थी। "अर्णव, इस घर की सीलन अब जा चुकी है बेटा। यहाँ अब धूप आती है और बच्चों का शोर भी। इसे बेचने की ज़रूरत नहीं है, यह घर अब सच में 'घर' बन गया है।"
अर्णव दूसरी तरफ चुप रह गया। उसे समझ नहीं आया कि जो काम उसकी दलीलें नहीं कर पाईं, वो एक छोटे बच्चे की मासूमियत और चाय की खुशबू ने कैसे कर दिया।
जगन बाबू ने फोन रखा और रसोई की ओर चल दिए। आज उन्होंने मेज़ पर दो कप रखे, पर दोनों भरे हुए थे। एक उनका अपना, और दूसरा उस हर इंसान के लिए जो उनकी ज़िंदगी में अब नया आने वाला था। मालती की याद अब बोझ नहीं, बल्कि वह मिठास बन गई थी जो हर कड़वे घूँट को पीने लायक बना देती थी।
अध्याय 7: मुकम्मल घूँट
वक्त अपनी रफ़्तार से गुज़रता रहा, पर जगन बाबू के घर की आब-ओ-हवा अब बदल चुकी थी। खिड़कियों पर धूल की जगह अब ताज़ा हवा के झोंके दस्तक देते थे। वह संदूक, जो कभी गम की भारी गठरी था, अब कहानियों का पिटारा बन चुका था।
आज मालती की बरसी थी। आमतौर पर यह दिन जगन बाबू के लिए भारी होता था। वह खुद को कमरे में बंद कर लेते थे और उन पुराने फटे हुए पन्नों को पढ़कर रोया करते थे। पर आज की सुबह कुछ अलग थी।
उन्होंने रसोई में जाकर चाय चढ़ाई। पानी के खौलने की आवाज़ उन्हें किसी संगीत जैसी लगी। उन्होंने अदरक, इलायची और थोड़ी सी काली मिर्च डाली। चाय की महक जब ऊपर उठी, तो उन्हें लगा जैसे मालती रसोई की खिड़की पर खड़ी मुस्कुरा रही हो। पर आज उस मुस्कुराहट में बिछड़ने का दर्द नहीं, बल्कि साथ होने का इत्मीनान था।
उन्होंने मेज़ पर दो कप रखे। पर आज का नज़ारा बदला हुआ था। उन्होंने उस 'दूसरे कप' को खाली नहीं छोड़ा। उन्होंने उसमें चाय भरी और बाहर बालकनी की मुंडेर पर रख दिया, जहाँ रोज़ सुबह एक गौरैया आकर बैठती थी।
जगन बाबू ने अपनी कुर्सी खींची और चाय का पहला घूँट लिया।
"मालती, देखो आज चाय बिल्कुल वैसी ही बनी है जैसी तुम्हें पसंद थी। न ज़्यादा मीठी, न ज़्यादा कड़वी," उन्होंने धीमे से कहा।
तभी नीचे से बच्चों के शोर की आवाज़ आई। चिक्कू और उसके दोस्त पार्क में खेल रहे थे। जगन बाबू ने ऊपर से ही उन्हें हाथ हिलाया। अब उन्हें शहर जाने का डर नहीं था, न ही अकेले रहने की घबराहट। उन्हें समझ आ गया था कि 'साथ' होना शरीर की मौजूदगी से बड़ा होता है। मालती उनके ख्यालों में थी, उनकी बातों में थी और उस हर नेक काम में थी जो वह अब कर रहे थे।
शाम को अर्णव फिर से आया। इस बार वह खाली डिब्बे लेकर नहीं आया था, बल्कि अपनी पत्नी और छोटे बच्चे के साथ आया था। घर में घुसते ही जब उसने बच्चों के खिलौने और मेज़ पर सजी हुई चाय की केतली देखी, तो उसकी आँखें भर आईं।
"बाबूजी, आप सचमुच बदल गए हैं," अर्णव ने उनके पैर छूते हुए कहा।
जगन बाबू ने उसे गले लगाया और कहा, "बेटा, बदला मैं नहीं हूँ, बस मैंने चाय पीने का तरीका बदल लिया है। पहले मैं यादों को पीता था और अब मैं यादों को जीता हूँ।"
उस रात, जब घर के सब लोग सो गए, जगन बाबू अपनी बालकनी में अकेले बैठे थे। आसमान साफ था और चाँद की चाँदनी चमेली के फूलों पर पड़ रही थी। उन्होंने अपना चाय का खाली कप मेज़ पर रखा। मेज़ की दूसरी तरफ रखा वह दूसरा कप भी अब खाली था—पर उसे किसी ने खाली नहीं किया था, बल्कि उसकी भाप हवा में मिलकर पूरे वातावरण को महका चुकी थी।
जगन बाबू को अब 'आधा कप चाय' की ज़रूरत नहीं थी। उनकी ज़िंदगी का प्याला अब पूरा भर चुका था।
यादें अब ज़हर नहीं, बल्कि वह खाद बन गई थीं जिसने उनके जीवन के सूखे पेड़ को फिर से हरा कर दिया था। उन्होंने अपनी आँखें मूँद लीं और एक ठंडी, सुकून भरी सांस ली। सन्नाटा अब उन्हें डराता नहीं था, वह तो मालती की लोरी जैसा मीठा लगने लगा था।

Kya hi gazab likhaa hai bahot khoob 💝🔥🌼💓
ReplyDeleteWaiting for second part ...
Thankyou so much 🤗
Delete🙌🥹Next part release date??
ReplyDeleteThis comment has been removed by the author.
Deleteआपकी यह कहानी वाकई लाजवाब है! आपने शब्दों को इतनी खूबसूरती और एहसास के साथ पिरोया है कि पढ़ते समय आँखों के सामने जगन बाबू का वह शांत घर, चाय की भाप और उनका अकेलापन बिल्कुल सजीव हो उठता है।
ReplyDeleteजैसा कि अध्याय के अंत में उन्हें डर लगा कि अगर उनके हाथ और काँपे तो क्या होगा?
क्या सच में उनके हाथ से कप छूटकर टूट जाता है? वह चीनी मिट्टी का नीले फूलों वाला पुराना कप, जो मालती की आखिरी निशानी जैसा था। उस कप के टूटने के बाद जगन बाबू का क्या होगा?
यह जानने के लिए मैं बहुत उत्सुक हूँ।
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DeleteWaiting for part 2
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