पुराना स्वेटर
अध्याय 1: संदूक की खामोशी
बरसात की वह दोपहर वैसी ही थी जैसी माँ को पसंद थी—धुंधली, नम और सोंधी मिट्टी की खुशबू से भरी। माँ को गुज़रे तीन साल बीत चुके थे, पर घर के उस पिछले कमरे में अब भी उनकी मौजूदगी की एक भारी गंध बसी थी। वह कमरा, जिसे हम सबने 'स्टोर रूम' का नाम दे दिया था, असल में माँ की यादों का कब्रिस्तान था।
मैंने भारी मन से वह पुरानी कुंडी खोली। कमरे के भीतर की हवा ठहरी हुई थी। धूल के ज़र्रे रोशनदान से आती सूरज की एक पतली सी किरण में नाच रहे थे। कोने में रखा था वह बड़ा सा लोहे का संदूक। वह संदूक, जिसे माँ हमेशा ताला लगाकर रखती थीं, जैसे उसमें उनके जीवन का कोई बहुत बड़ा राज़ दफ़न हो।
ताला खोलने पर जो चरमराहट हुई, वह सन्नाटे में किसी चीख की तरह गूँजी। ऊपर कुछ पुरानी साड़ियाँ थीं—वही सूती साड़ियाँ जिन्हें पहनकर माँ रसोई में घंटों पसीना बहाया करती थीं। उन्हें छूते ही उनकी हथेलियों का खुरदरापन महसूस हुआ। साड़ियों के नीचे, सबसे तह में, मलमल के एक सफेद कपड़े में लिपटा हुआ कुछ भारी सा रखा था।
मैंने उसे बाहर निकाला। वह एक स्वेटर था। गहरा नीला, जैसे रात का आकाश होता है।
पर वह अधूरा था।
उसकी एक आस्तीन पूरी तरह बुनी जा चुकी थी, दूसरी आस्तीन का काम अभी कंधों तक ही पहुँचा था। ऊन का एक गोला अब भी सलाई से लटका हुआ था, जैसे समय वहीं रुक गया हो। वह ऊन अब सख़्त हो चुका था, मानों माँ की उन हज़ारों अनकही शिकायतों की तरह जो वक्त के साथ पत्थर बन जाती हैं।
मुझे याद आया, यह स्वेटर उन्होंने मेरे लिए शुरू किया था जब मैं दसवीं कक्षा में थी। मुझे नीले रंग से नफरत थी और मैंने उनसे बहुत झगड़ा किया था। "माँ, ये बुढ्ढों जैसा रंग क्यों चुन लिया? मुझे नहीं पहनना ये!"
माँ ने तब कुछ नहीं कहा था। बस अपनी सलाई नीचे रख दी थी और चश्मा उतारकर धुंधली आँखों से खिड़की के बाहर देखने लगी थीं। मुझे लगा था कि वह हमेशा की तरह कुछ देर में मान जाएंगी और कोई नया रंग ले आएँगी। पर उस दिन के बाद मैंने उन्हें फिर कभी बुनते हुए नहीं देखा।
आज जब मैंने उस अधूरे स्वेटर को अपने जिस्म से लगाकर देखा, तो एहसास हुआ कि वह 'नीला रंग' बुढ्ढों वाला नहीं था, वह तो उस समंदर जैसा था जिसे माँ ने अपने भीतर पी रखा था। वह अधूरा स्वेटर दरअसल माँ की उस ममता का प्रतीक था, जिसे मैंने अपनी आधुनिकता के अहंकार में ठुकरा दिया था।
स्वेटर का वह उधड़ा हुआ सिरा मेरे हाथ में था। मैंने उसे खींचने की कोशिश की, पर रुक गई। अगर मैं इसे उधेड़ देती, तो शायद वह आखिरी धागा भी टूट जाता जो मुझे माँ से जोड़ता था। हम अक्सर सोचते हैं कि हम बड़े हो गए हैं, हमने दुनिया देख ली है, पर सच तो यह है कि माँ की गोद से बाहर निकलते ही हम सब बस 'उधड़ते' ही रहते हैं।
रिश्ते भी तो इसी ऊन की तरह होते हैं—जरा सा खिंचाव और सब बिखर जाता है। माँ ने वह स्वेटर अधूरा क्यों छोड़ा? क्या उन्हें समझ आ गया था कि उनकी बेटी अब उनके बुने हुए रास्तों पर नहीं चलना चाहती? या फिर उन्होंने उस आधे स्वेटर में ही अपना पूरा प्यार बुन दिया था?
मैंने उस सलाई को छुआ। वह ठंडी थी, पर मेरा कलेजा जल रहा था। उस स्टोर रूम के सन्नाटे में मुझे माँ की सलाईयों की वह 'खट-खट' सुनाई देने लगी। वह आवाज़, जो कभी मुझे चिड़चिड़ा कर देती थी, आज संगीत जैसी लग रही थी।
अध्याय 2: स्मृतियों की उधड़न
उस संदूक के पास बैठी मैं न जाने कितनी देर तक उस आधे बुने स्वेटर के रेशों को सहलाती रही। वह ऊन मेरी उंगलियों में चुभ रहा था, बिल्कुल वैसे ही जैसे माँ की कुछ पुरानी बातें आज मेरे कानों में चुभ रही थीं। स्मृतियों का एक सिरा हाथ क्या लगा, यादों का पूरा का पूरा पहाड़ दरकने लगा।
मुझे याद है, वह साल 2012 की सर्दियों की शुरुआत थी। शहर में नई-नई मॉल संस्कृति पैर पसार रही थी और मेरे जैसे कॉलेज जाने वाले युवाओं के लिए 'ब्रांड' ही पहचान का एकमात्र पैमाना बन गया था। उन दिनों मुझे हाथ से बुने हुए स्वेटर 'देहाती' लगते थे। मुझे शर्म आती थी यह सोचकर कि मेरी सहेलियाँ जब 'ज़ारा' या 'मैंगो' के कोट पहनेंगी, तब मैं माँ के हाथों का बुना हुआ यह मोटा सा, नीला स्वेटर पहनकर उनके सामने कैसे जाऊँगी?
"माँ, आप क्यों अपना वक्त बर्बाद करती हैं? अब कोई हाथ के बुने स्वेटर नहीं पहनता। बाज़ार में इससे कहीं पतले और स्टाइलिश स्वेटर मिलते हैं," मैंने एक शाम चिढ़कर कहा था।
माँ उस समय फंदे गिरा रही थीं। उन्होंने चश्मे के ऊपर से मुझे देखा—उनकी आँखों में कोई गुस्सा नहीं था, बस एक अजीब सी विरक्ति थी। उन्होंने बहुत शांति से कहा था, "बाज़ार जो बेचता है वो बदन ढकता है बिटिया, जो हाथ बुनता है वो रूह को गर्माहट देता है। ऊन के इन फंदों के बीच मैं अपनी दुआएं बुनती हूँ, बाज़ार की मशीनों में दुआएं नहीं होतीं।"
मैंने उस वक्त सिर्फ़ अपनी नाक सिकोड़ी थी। मुझे उनकी बातें दार्शनिक कम और दकियानूसी ज़्यादा लगती थीं।
उसी शाम हमारा वह बड़ा झगड़ा हुआ था। मैंने ज़िद पकड़ ली थी कि मुझे एक महंगा लेदर जैकेट चाहिए। पिता जी की आमदनी सीमित थी और घर के खर्चों की फेहरिस्त लंबी। माँ ने उस रात रोटियाँ बेलते हुए बस इतना कहा था, "लेदर की खाल ओढ़ने से इंसान बड़ा नहीं होता। अपनी चादर देखकर पैर पसारना सीख।"
मेरा पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया था। मैंने गुस्से में कह दिया था, "आपकी इस चादर और इस ऊन ने मेरा दम घोंट रखा है! मुझे नहीं चाहिए आपका ये नीला स्वेटर और न ही आपकी ये सीख।"
उस रात घर में सन्नाटा पसर गया था। रसोई से बर्तनों के टकराने की आवाज़ें आ रही थीं, जो माँ के भीतर चल रहे तूफ़ान का एकमात्र संकेत थीं। अगले दिन जब मैं उठी, तो देखा कि वह नीले ऊन का गोला और सलाईयाँ मेज़ से गायब थीं। मुझे लगा माँ मान गई हैं, उन्होंने बुनना छोड़ दिया है।
पर आज, इस संदूक के भीतर उस स्वेटर की अधूरी आस्तीन देखकर मेरी रूह कांप गई। माँ ने बुनना छोड़ा नहीं था, उन्होंने उसे 'छिपा' दिया था। वह मेरे सो जाने के बाद, रात के अंधेरे में, उस एक लैम्प की रोशनी में इसे बुनती रही होंगी। वह नीला रंग, जिसे मैंने 'बुढ्ढों वाला' कहकर ठुकरा दिया था, दरअसल माँ की पसंदीदा साड़ी का रंग था। वह मुझे अपने सबसे प्रिय रंग में लपेटना चाहती थीं।
मैंने गौर से देखा, तो स्वेटर के उन फंदों में कहीं-कहीं गांठें पड़ी हुई थीं। कहते हैं कि बुनते वक्त अगर बुनने वाले का मन अशांत हो या वह रो रहा हो, तो फंदे अक्सर गलत गिर जाते हैं। उन गांठों को छूकर मुझे महसूस हुआ कि हर गांठ माँ के एक दबे हुए आंसू की गवाही दे रही थी। वह अपनी बेटी के लिए सुरक्षा कवच बुन रही थी और मैं उस कवच को ही बोझ समझ बैठी थी।
कितनी अजीब बात है न? हम जब जवान होते हैं, तो हमें लगता है कि हमारे माता-पिता हमारे पंख काट रहे हैं। हम आज़ादी के नाम पर उन धागों को तोड़ देना चाहते हैं जो हमें जड़ों से बांधे रखते हैं। और जब हम सच में आज़ाद हो जाते हैं, जब वो धागे सच में टूट जाते हैं, तब समझ आता है कि उन धागों के बिना हम सिर्फ़ एक पतंग हैं जो कट चुकी है और जिसका गिरना तय है।
मैंने उस सलाई को फिर से पकड़ा। उसकी नोक अब भी तेज़ थी। अचानक मेरा मन किया कि मैं इस स्वेटर को पूरा करूँ। पर मुझे तो बुनना आता ही नहीं था। मैंने कभी सीखने की कोशिश ही नहीं की। माँ अक्सर कहती थीं, "सीख ले बिटिया, ज़िंदगी में कब कौन सा सिरा उधड़ जाए, पता नहीं चलता। उधड़े हुए को जोड़ना आना चाहिए।"
आज मेरा सब कुछ उधड़ गया था। मेरा घर, मेरी पहचान और वह गुरूर जो मुझे लगता था कि मुझे बड़ा बनाता है। मैं उस अधूरे स्वेटर को सीने से लगाकर उसी ठंडे फर्श पर बैठ गई। बाहर बारिश तेज़ हो गई थी। हर बूंद जैसे माँ की आवाज़ में पूछ रही थी— "अब मिल गई आज़ादी? अब मिल गया चैन?"
अध्याय 3: नीले रंग की ओट
उस अधूरे स्वेटर को हाथ में लिए मेरा मन बेचैन था। वह नीला रंग अब सिर्फ़ एक रंग नहीं, एक अनसुलझी पहेली बन चुका था। अगले दिन मैं माँ की सबसे पुरानी सहेली, जिन्हें हम सब 'मालती मौसी' कहते थे, उनके घर पहुँची। मालती मौसी और माँ का साथ उस दौर से था जब सड़कों पर गाड़ियाँ कम और मोहल्लों में बातें ज़्यादा हुआ करती थीं।
मौसी ने जब मुझे उस नीले स्वेटर के साथ देखा, तो उनकी आँखों में एक चमक सी आई और फिर एक गहरी उदासी छा गई। उन्होंने मुझे पास बिठाया और चाय का कप पकड़ाते हुए बोलीं, "तो आख़िरकार तुझे यह मिल ही गया। तेरी माँ ने इसे बड़े जतन से छिपाया था।"
"मौसी, माँ ने यह नीला रंग ही क्यों चुना? उन्हें पता था मुझे यह पसंद नहीं है, फिर भी वो रात-रात भर इसे क्यों बुनती रहीं?" मैंने अपनी जिज्ञासा को शब्दों में ढालते हुए पूछा।
मालती मौसी ने एक लम्बी ठंडी साँस भरी और खिड़की के बाहर अमरूद के पेड़ को निहारते हुए कहने लगीं, "यह नीला रंग तेरी माँ का नहीं, बल्कि उसके उन सपनों का था जो कभी परवान नहीं चढ़ पाए। तुझे पता है, तेरी माँ अपने कॉलेज के दिनों में एक कवयित्री बनना चाहती थी? उसे आसमान से बहुत लगाव था। वो कहती थी कि नीला रंग आज़ादी का रंग है। जब उसकी शादी तय हुई, तो उसके पास नीले रंग की एक डायरी थी जिसमें उसने अपनी सारी कविताएँ लिख रखी थीं।"
मैं हैरान थी। मैंने अपनी माँ को सिर्फ़ रसोई के धुएं, घर के हिसाब-किताब और हमारी परवरिश की चिंताओं में ही देखा था। कविताएँ? यह शब्द मेरी माँ के व्यक्तित्व से इतना अलग था कि मुझे यकीन करना मुश्किल हो रहा था।
मौसी आगे बोलीं, "शादी के बाद ज़िम्मेदारियों का बोझ ऐसा बढ़ा कि वो डायरी कहीं बक्से के नीचे दब गई। तेरे पिता जी बुरे इंसान नहीं थे, पर वो एक ऐसे सांचे में ढले थे जहाँ औरत का काम सिर्फ़ घर संभालना था। तेरी माँ ने कभी कोई शिकायत नहीं की, पर उसने लिखना छोड़ दिया। जब तू पैदा हुई, तो उसने अपनी आज़ादी के उस नीले आसमान को तेरे भीतर देखना चाहा। वह तुझे वह सब देना चाहती थी जो उसे नहीं मिला। वह नीला स्वेटर सिर्फ़ एक लिबास नहीं था, वह तुझे अपनी उस 'आज़ादी' में लपेटने की एक कोशिश थी जिसे उसने सालों पहले खो दिया था।"
मेरे हाथों में रखा वह स्वेटर अब मुझे भारी लगने लगा था। वह माँ की ममता के साथ-साथ उनके बलिदान की कहानी भी कह रहा था। वह अधूरी आस्तीन अब मुझे एक अधूरे जीवन की तरह लग रही थी।
"पर मौसी, उन्होंने इसे पूरा क्यों नहीं किया?" मैंने भारी आवाज़ में पूछा।
मालती मौसी ने मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा, "जिस दिन तूने उस नीले रंग को 'बुढ्ढों वाला' और 'बदसूरत' कहा था, उस दिन सिर्फ़ एक स्वेटर का बुनना नहीं रुका था, उस दिन तेरी माँ की वह उम्मीद भी टूट गई थी कि उसकी बेटी उसके उन दबे हुए सपनों को समझेगी। उसे लगा कि उसकी आज़ादी का रंग तेरी नज़रों में बोझ है। उसने सलाईयाँ रख दीं, क्योंकि उसे लगा कि अब बुनने का कोई अर्थ नहीं बचा।"
मैं चुप थी। मेरे पास कहने को कुछ नहीं था। हमारे माता-पिता हमारे लिए क्या-क्या कुर्बान कर देते हैं और हम उसे अपना 'हक' समझकर ठुकरा देते हैं। हम उनकी खामोशी को उनकी सादगी समझ लेते हैं, जबकि वह खामोशी अक्सर उनकी टूटी हुई ख्वाहिशों का शोर होती है।
उस शाम घर लौटते हुए मैंने बाज़ार के उन बड़े-बड़े शोरूम्स को देखा। वहाँ हज़ारों नीले स्वेटर टंगे थे, पर उनमें से किसी में भी वह 'नीलापन' नहीं था जो माँ के उस ऊन के गोले में था। उन मशीनी धागों में कोई कहानी नहीं थी, कोई दुआ नहीं थी, और सबसे बढ़कर—उनमें किसी माँ का अधूरा आसमान नहीं था।
मैंने तय कर लिया था। मैं उस स्वेटर को अधूरा नहीं रहने दूंगी। भले ही मुझे बुनना न आता हो, भले ही मेरे हाथ कांपते हों, पर मैं उस नीले रंग को उसकी मंज़िल तक ज़रूर पहुँचाऊंगी। माँ की वह अधूरी कविता अब मैं पूरी करूँगी।
अध्याय 4: फंदों की उलझन
अगले कई दिन मैंने उस संदूक के पास ही गुज़ारे। मैंने अपनी अलमारी के सबसे महँगे कोट और जैकेट एक तरफ हटा दिए थे। अब मेरे कमरे के केंद्र में सिर्फ वह नीला अधूरा स्वेटर था। मैंने यूट्यूब पर वीडियो देखे, पड़ोस की उन दादी माँ से मिलने गई जो आज भी ऊन बुनती थीं, और अंत में सलाईयाँ उठा ही लीं।
जब पहली बार मैंने उन स्टील की सलाईयों को हाथ में लिया, तो वह मुझे किसी भारी औज़ार जैसी लगीं। पहली बार अहसास हुआ कि जो काम माँ हँसते-हँसते, टीवी देखते हुए या हमसे बातें करते हुए कर लिया करती थीं, वह कितना गणितीय और थका देने वाला है। फंदे बढ़ाना, घटाना, डिज़ाइन डालना—यह सब सिर्फ़ उंगलियों का खेल नहीं था, यह ध्यान की एक पराकाष्ठा थी।
शुरुआती दो घंटे में ही मेरी आँखों में दर्द होने लगा और पीठ अकड़ गई। मैंने दो-चार फंदे बुने, पर वे इतने ढीले और टेढ़े-मेढ़े थे कि माँ का बुना हुआ हिस्सा उनके सामने किसी शिल्पकार की कलाकृति जैसा लग रहा था। गुस्से और हताशा में मैंने सलाईयाँ पटक दीं।
"नहीं होगा मुझसे!" मैं चिल्लाई। मेरा गला रुँध गया था।
उसी पल कमरे में पिता जी दाखिल हुए। उन्होंने ज़मीन पर बिखरे नीले ऊन को देखा और फिर मेरी आँखों में तैरते आँसुओं को। वे चुपचाप आए, सलाईयाँ उठाईं और उन्हें मेज़ पर सहेज कर रख दिया।
"तेरी माँ कहती थी," पिता जी की आवाज़ में एक पुरानी खनक थी, "कि बुनना सिर्फ़ ऊन को जोड़ना नहीं है, अपनी बेचैनी को शांत करना है। तू इसे एक काम समझकर कर रही है, इसलिए थक रही है। इसे अपनी माँ से बात करने का ज़रिया समझ, फिर देख हाथ कैसे चलते हैं।"
मैंने पिता जी को देखा। उनकी आँखों में भी शायद वही पछतावा था जो मेरे भीतर पल रहा था। उन्होंने कभी माँ के इस हुनर को सराहा नहीं था, पर आज वे मुझे उसे पूरा करने के लिए उकसा रहे थे।
"पिता जी, क्या माँ खुश थीं?" मैंने अचानक वह सवाल पूछ लिया जो सालों से मेरे भीतर दबा था।
उन्होंने खिड़की के बाहर देखा, जहाँ शाम का धुंधलका गहरा रहा था। "खुशी एक बहुत बड़ा शब्द है, बेटा। उसने अपने हिस्से की खुशियाँ तुम्हारी मुस्कुराहटों में ढूँढ ली थीं। पर हाँ, उसके भीतर एक कलाकार था जिसे हमने कभी उभरने नहीं दिया। उसे लिखने का शौक था, उसे बुनने का शौक था... हम उसे सिर्फ़ 'माँ' और 'पत्नी' समझते रहे, उसे एक 'इंसान' की तरह देखना भूल गए।"
उस रात मैंने फिर से सलाईयाँ उठाईं। इस बार कोई जल्दी नहीं थी। मैंने एक-एक फंदा बड़े प्यार से पिरोना शुरू किया। हर फंदे के साथ मैं माँ को याद कर रही थी। उनकी वह हल्की सी मुस्कान, उनकी वह डाँट जिसमें चिंता छिपी होती थी, और उनकी वह खामोशी जिसे मैं समझ नहीं पाई थी।
अजीब बात थी, जैसे ही मैंने माँ को महसूस करना शुरू किया, सलाईयाँ खुद-ब-खुद चलने लगीं। वह नीला ऊन अब मेरी उंगलियों में चुभ नहीं रहा था, बल्कि रेशम की तरह फिसल रहा था। मुझे लगा जैसे माँ मेरे पीछे खड़ी हैं, मेरे कन्धों पर हाथ रखे हुए और धीमे से कह रही हैं— *"सावधान, फंदा गिर न जाए।"*
रात के तीन बज रहे थे, पर मुझे नींद नहीं थी। मैं उस अधूरी आस्तीन को बढ़ा रही थी। हर इंच जो मैं बुन रही थी, वह मेरे प्रायश्चित की एक लकीर थी। मुझे समझ आया कि माँ क्यों रात-रात भर जागती थीं। सन्नाटे में जब दुनिया सो जाती है, तब एक औरत अपने सपनों को बुनती है।
लेकिन जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ी, मुझे अहसास हुआ कि ऊन कम पड़ रहा है। माँ ने जितना ऊन संदूक में रखा था, वह आस्तीन के अंत तक पहुँचते-पहुँचते खत्म होने वाला था। और यह वह खास ऊन था जो बरसों पुराना था, जिसका रंग अब बाज़ार में मिलना नामुमकिन था।
मेरी धड़कनें तेज़ हो गईं। क्या यह स्वेटर फिर से अधूरा रह जाएगा? क्या मेरी माँ की कहानी का अंत कभी पूरा नहीं होगा?
अध्याय 5: शेष रह गया सिरा
ऊन का वह आखिरी गोला मेरी हथेली में सिमट आया था। वह धीरे-धीरे छोटा हो रहा था, और मेरी घबराहट उतनी ही बड़ी। मैंने नाप कर देखा, आस्तीन का बॉर्डर अभी चार इंच बाकी था। बाज़ार में अब वैसा गहरा, स्याही जैसा नीला ऊन मिलना नामुमकिन था; वह माँ के ज़माने की कताई थी, जिसमें एक खास तरह की चमक और खुरदरापन साथ-साथ चलते थे।
मैं पागलों की तरह फिर से उस पुराने संदूक की ओर दौड़ी। मैंने साड़ियों की तहें उलट दीं, पुराने बर्तनों के बीच हाथ मारा, यहाँ तक कि अखबारों की उन रद्दी परतों को भी झाड़ दिया जो सालों से वहां सो रही थीं। पर कहीं भी उस नीले ऊन का अंश तक नहीं मिला।
हाँ, पर उस खोजबीन में संदूक के सबसे निचले कोने में एक छोटी सी लकड़ी की डिबिया मिली। उस पर धूल की एक ऐसी परत थी जो गवाही दे रही थी कि इसे दशकों से किसी ने नहीं छुआ।
मैंने धक-धक करते दिल के साथ उसे खोला। अंदर ऊन तो नहीं था, पर कुछ ऐसा था जिसने मेरी साँसें रोक दीं। वह माँ की वही पुरानी, नीली डायरी थी जिसका ज़िक्र मालती मौसी ने किया था। उसके पन्ने पीले पड़ चुके थे और उनमें से सूखी हुई नमी और पुरानी यादों की एक महक आ रही थी।
मैंने पहला पन्ना पलटा। वहां माँ की लिखावट थी—साफ, सुथरी और मोतियों जैसी। पहली कविता का शीर्षक था: 'आसमान का टुकड़ा'।
जैसे-जैसे मैं पढ़ती गई, माँ का एक नया रूप मेरे सामने खुलता गया। वह माँ, जो रसोई में दाल के तड़के और घर के बजट के लिए पिता जी से बहस करती थी, वह पन्नों पर कितनी आज़ाद थी! उसकी कविताओं में उड़ते हुए परिंदे थे, बहती हुई नदियाँ थीं और एक ऐसा नीले रंग का ज़िक्र था जो उसे सुकून देता था।
अंतिम पन्ने पर आकर मेरी उंगलियां रुक गईं। वहां कोई कविता नहीं थी, बस एक अधूरी इबारत थी, जो शायद उन्होंने उसी दिन लिखी थी जिस दिन मैंने उस नीले स्वेटर को ठुकराया था।
उसने लिखा था:
"आज अहसास हुआ कि हुनर और ममता में एक ही फर्क है। हुनर की कद्र दुनिया करती है, पर ममता की कद्र सिर्फ़ उसे होती है जो उसे महसूस करना चाहे। मैंने अपनी डायरी बंद कर दी थी ताकि मैं उसकी ज़िंदगी के खाली पन्ने भर सकूँ। पर आज उसकी बातों ने बताया कि वह मेरी स्याही को बोझ समझती है। शायद यह नीला रंग अब सिर्फ़ मेरा है, उसका नहीं। मैं इसे अधूरा ही छोड़ दूँगी, क्योंकि अधूरी चीज़ें ही अक्सर याद रह जाती हैं।"
मेरे आंसू उन पीले पन्नों पर गिरकर स्याही को फैलाने लगे। माँ ने लिखना नहीं छोड़ा था, माँ ने 'उम्मीद' छोड़ दी थी। वह नीला स्वेटर उनकी उसी उम्मीद का आखिरी सिरा था।
तभी डायरी के पीछे वाले कवर के साथ चिपका हुआ एक छोटा सा मलमल का टुकड़ा दिखा। मैंने उसे खींचा, तो उसके अंदर से नीले ऊन के दो छोटे-छोटे गोले निकले। माँ ने शायद उन्हें 'बैकअप' के तौर पर रखा होगा, या शायद उन्हें पता था कि एक दिन उनकी बेटी इस अधूरेपन को भरने की कोशिश करेगी।
मैंने उन गोलों को चूमा। वे थोड़े मटमैले हो गए थे, पर मेरे लिए दुनिया की सबसे कीमती चीज़ थे।
मैं वापस अपनी कुर्सी पर बैठी और सलाईयाँ उठा लीं। अब डर नहीं था। अब मुझे पता था कि मुझे क्या बुनना है। मैं सिर्फ़ आस्तीन नहीं बुन रही थी, मैं माँ के उस अधूरे पत्र का उत्तर बुन रही थी। रात का सन्नाटा अब मुझे डरा नहीं रहा था, वह मुझे माँ की उसी नीली डायरी की आवाज़ सुना रहा था।
हर फंदे के साथ मैं मन ही मन कह रही थी— "माँ, देखो, मैं देख रही हूँ। आपका नीला रंग बोझ नहीं है, यह मेरा आसमान है। मैं इसे पहनूँगी, और मैं इसे दुनिया को दिखाऊँगी।"
भोर की पहली किरण जब खिड़की से अंदर आई, तो सलाईयों की अंतिम 'खट' सुनाई दी। स्वेटर पूरा हो चुका था।
अध्याय 6: अहसास का लिबास
भोर की वह पहली किरण जब मेरे कमरे के फर्श पर पड़ी, तो सलाईयों की आख़िरी 'खट' एक सुकून भरी गूँज के साथ शांत हुई। मैंने अंतिम फंदा बांधा और उस धागे को अपने दांतों से काट दिया। वह सिर्फ़ एक धागा नहीं था, वह मेरे और माँ के बीच तनी हुई उस कड़वाहट की आख़िरी दीवार थी, जो अब गिर चुकी थी।
स्वेटर पूरा हो चुका था। गहरा नीला, स्याही जैसा, बिल्कुल वैसा ही जैसा माँ की उस पुरानी डायरी का कवर था।
मैंने कांपते हाथों से उसे उठाया। ऊन की वह पुरानी महक, जिसमें थोड़ी सी नमी और बहुत सारा अपनापन बसा था, सीधे मेरे फेफड़ों में उतर गई। मैंने उसे पहना। वह स्वेटर मेरी देह पर बिल्कुल सटीक बैठा, जैसे माँ ने बरसों पहले ही मेरा आज का वजूद नाप लिया हो। उसे पहनते ही मुझे एक अजीब सी गर्माहट महसूस हुई—यह वह गर्मी नहीं थी जो ऊन देता है, यह वह सुरक्षा थी जो सिर्फ़ एक माँ की आलिंगन में मिल सकती है।
मैंने आईने के सामने जाकर खुद को देखा। मेरी आँखों के नीचे रात भर जागने के काले घेरे थे, बाल बिखरे हुए थे, पर उस नीले स्वेटर में मैं खुद को दुनिया की सबसे खूबसूरत औरत महसूस कर रही थी। वह रंग, जिसे मैं कभी 'बदशक्ल' कहती थी, आज मेरी त्वचा पर खिल रहा था।
तभी कमरे के दरवाज़े पर एक हल्की सी दस्तक हुई। पिता जी हाथ में चाय का कप लिए खड़े थे। उनकी नज़र जब मुझ पर पड़ी, तो उनके हाथ कांप गए और चाय की कुछ बूंदें तश्तरी में छलक गईं। उन्होंने कप मेज़ पर रखा और चश्मा उतारकर अपनी धुंधली आँखों को साफ़ किया।
"कुमुद..." उनके मुँह से सिर्फ़ माँ का नाम निकला।
शायद उस सुबह, उस नीले स्वेटर में उन्हें मैं नहीं, बल्कि अपनी वही पुरानी 'कुमुद' नज़र आ रही थी जो कभी अपनी नीली डायरी लेकर खिड़की के पास बैठा करती थी। वे धीरे-धीरे मेरे पास आए और मेरे स्वेटर की उस आस्तीन को छुआ जिसे मैंने अभी-अभी पूरा किया था।
उनके खुरदरे हाथ जब उस ऊन पर फिरे, तो उनकी आँखों से एक आंसू टपक कर मेरे कंधे पर गिर गया।
"उसने ठीक ही कहा था," पिता जी की आवाज़ भर्रा गई थी, "कि एक दिन तू इसे ज़रूर पहनेगी। उसने मरते वक्त मुझसे कहा था कि स्वेटर को फेंकना मत, इसे संदूक में सबसे नीचे रख देना। उसे यकीन था कि तू एक दिन अपनी जड़ें ढूँढते हुए उस संदूक तक ज़रूर पहुँचेगी।"
मैं पिता जी के सीने से लगकर फूट-फूट कर रो पड़ी। वह रोना बरसों के उस बोझ को उतारने जैसा था जो मैं 'आधुनिक' बनने की चाह में ढो रही थी।
"पिता जी, मैं कितनी गलत थी," मैंने सिसकियों के बीच कहा, "मैंने माँ को कभी समझने की कोशिश ही नहीं की। मैं तो सिर्फ़ उनकी कमियां देखती रही, उनकी खामोशियों के पीछे छिपा संगीत कभी सुना ही नहीं।"
पिता जी ने मेरे सिर पर हाथ फेरा। "गलती तेरी नहीं थी बेटा, गलती हमारी इस दुनिया की है जो 'माँ' को एक भगवान का दर्जा दे देती है और यह भूल जाती है कि वह भी एक इंसान है, जिसके अपने शौक हैं, अपने रंग हैं और अपनी अधूरी ख्वाहिशें हैं। आज तूने यह स्वेटर पूरा करके उसे फिर से जी दिया है।"
उस दिन मुझे समझ आया कि विरासत सिर्फ़ ज़मीन-जायदाद या गहने नहीं होते। विरासत तो वह अधूरा काम है जिसे हमारे बड़े छोड़ जाते हैं, ताकि हम उसे पूरा करके उनके वजूद को मुकम्मल कर सकें। माँ की वह नीली डायरी और यह नीला स्वेटर—ये मेरे जीवन के दो सबसे बड़े सबक थे।
मैंने खिड़की खोली। बाहर आसमान का रंग भी बिल्कुल वैसा ही नीला था। मैंने हाथ बाहर निकाला और महसूस किया कि अब मैं भी उस आसमान का एक हिस्सा हूँ।
अध्याय 7: अधूरापन ही मुकम्मल है
सर्दियों की उस गुनगुनी धूप में, शहर के एक छोटे से लिटरेरी कैफे में आज बहुत भीड़ थी। हवा में कॉफी की महक और पुरानी किताबों की सोंधी खुशबू घुली हुई थी। मैं मंच के पीछे खड़ी अपनी बारी का इंतज़ार कर रही थी। मैंने आज भी वही नीला स्वेटर पहना था। अब इसका रंग थोड़ा फीका पड़ने लगा था और कोहनियों के पास से ऊन थोड़ा घिस गया था, पर मेरे लिए यह किसी शाही लिबास से कम नहीं था।
आज माँ की उस नीली डायरी का विमोचन था। मैंने उनकी उन तमाम कविताओं को इकट्ठा करके एक किताब का रूप दिया था, जिसका शीर्षक मैंने रखा था— "नीले ऊन की गिरहें"।
जब मेरा नाम पुकारा गया, तो मेरे पैर हल्के से डगमगाए। मैंने मंच पर जाकर माइक संभाला और सामने बैठी भीड़ को देखा। वहां पिता जी सबसे आगे की कतार में बैठे थे, उनकी आँखों में गर्व और नमी का एक अजीब संगम था। मालती मौसी भी वहीं थीं, मुस्कुराते हुए मुझे देख रही थीं।
मैंने बोलना शुरू किया, "हम अक्सर सोचते हैं कि विरासत का मतलब सोना, चांदी या ज़मीन होता है। पर मुझे विरासत में एक अधूरा स्वेटर मिला था। एक ऐसा स्वेटर जिसे मैंने कभी बदसूरत कहा था। मुझे लगता था कि मेरी माँ सिर्फ़ एक घरेलू महिला हैं जिन्हें दुनिया की समझ नहीं। पर जब मैंने उनकी कविताओं को पढ़ा और इस स्वेटर के हर फंदे को अपनी उंगलियों से बुना, तब मुझे समझ आया कि एक औरत की खामोशी के पीछे कितने ब्रह्मांड दफ़न होते हैं।"
मैंने किताब का एक पन्ना खोला और माँ की वह आख़िरी कविता पढ़ी जो उन्होंने उस दिन लिखी थी जब उन्होंने बुनना छोड़ दिया था। पूरा हॉल सन्नाटे में डूब गया। लोगों की आँखों में अपने-अपने माता-पिता के प्रति वह पछतावा और प्रेम साफ़ दिख रहा था जो अक्सर हम बयां नहीं कर पाते।
कार्यक्रम खत्म होने के बाद, एक छोटी सी लड़की मेरे पास आई। उसने मेरे स्वेटर की आस्तीन को छुआ और बड़े भोलेपन से पूछा, "दीदी, आपकी आस्तीन के पास ये छोटा सा छेद कैसा है? आपने इसे ठीक क्यों नहीं किया?"
मैंने मुस्कुराकर उसे करीब बुलाया और कहा, "बेटा, ये छेद नहीं है, ये वो जगह है जहाँ से हवा और यादें अंदर आती हैं। मैंने इसे जानबूझकर नहीं भरा, क्योंकि अगर सब कुछ मुकम्मल हो जाए, तो फिर ज़िंदगी में ढूँढने को क्या बचेगा? कुछ चीज़ें अधूरी ही खूबसूरत होती हैं।"
घर लौटते वक्त मैंने रास्ते में वही नीला आसमान देखा। अब मुझे समझ आ गया था कि माँ ने मुझे इसी रंग में क्यों लपेटना चाहा था। नीला रंग सिर्फ आज़ादी का नहीं, बल्कि 'असीमित' होने का रंग है। माँ मरकर भी मरी नहीं थीं, वो मेरे शब्दों में, मेरे पहने हुए इस स्वेटर में और मेरी रगों में दौड़ते उस नीले जज़्बात में ज़िंदा थीं।
मैंने घर पहुँचकर वह स्वेटर उतारा और उसे बड़ी सावधानी से वापस उसी संदूक में रख दिया। पर इस बार संदूक पर ताला नहीं लगाया। यादों को कैद नहीं किया जाना चाहिए, उन्हें तो खुली हवा में छोड़ देना चाहिए ताकि जब भी कोई उधड़ा हुआ मन वहां से गुज़रे, उसे गर्माहट मिल सके।
आज की रात मुझे डर नहीं था। मैंने मेज़ पर एक नया सफेद कागज़ रखा, नीली स्याही वाला पेन उठाया और अपनी पहली लाइन लिखी—
"माँ, आज मैंने भी बुनना शुरू कर दिया है... शब्दों को।"

Is story ne sach me mujhe rula diya aur meri swargiya maata, pita aur bhai ki yaad dila di. ye sach me ek bahut uch koti ki lekhika hi likh sakti hai.
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